Frida Kahlo
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On January 10, 2016, when I posted a poem by Ashraf Fayadh translated by Mona Kareem and suggested through a comment, almost as an afterthought, that it would be great if someone can help translate it into Malayalam, I never imagined it would be greeted which so much of familial love from community of poets; that poetry lovers worldwide would offer translations of Frida Kahlo’s Mustache in 7 languages including French (James Lewis) and – surprise of surprises – the Chadic Hausa (Ibrahim Malumfashi), which like the Arab world, has a rich tradition of oral poetry. Five of the translations are in Indian languages – Bengali by Subhodip Maitro, Hindi by Sandeep Kulshreshta, Urdu by Huzaifa Pundit, Tamil by Dinesh Sairam and Malayalam by my own dear friend Ravi Shankar. I hope Ashraf’s voice echoes in many more languages of the world leading upto his freedom. Love and hug to each one of you.
BINU KARUNAKARAN, Poet & Journalist

 

POEM: FRIDA KAHLO’S MUSTACHE

BY ASHRAF FAYADH/ Tr. MONA KAREEM

I will ignore the smell of mud, and the need to reprimand the rain,
and the burn that has long since settled in my chest.
I am looking for fitting consolation for my situation, which doesn’t allow me
to interpret your lips however I wish
Or to brush away the drops of mist from your reddish petals
Or to ratchet down the level of obsession that overtakes me when I realize
you are not beside me at the moment
And will not be… When I am forced to justify my position to the punishing
silence of the night.
Just act as if the earth is silent, as we see it from a distance,
and that everything that’s happened between us was not more than
a bad joke that’s gone too far!

#
What do you think of the days I spent without you?
About the words that evaporated so quickly from my heavy pain?
About the knots that were deposited in my chest like dried algae?
I forgot to tell you that I’ve grown used to your absence (technically speaking)
And that wishes lose their way to your desires
And my memory is being eroded.
That I am still chasing the light, not to see, but because darkness
is scary…even if we get used to it!
Would my apology be enough? For everything that has happened while
I tried to make up good excuses.

#
For every time jealousy was aroused in my chest,
For every time despair ruined a new day of my dark days,
For every time I said Justice would get menstrual cramps and Love
was a feeble-minded man in the autumn of his age with erectile dysfunction!

#
I will have to sidestep my memory
And claim that I sleep well.
I’ve got to tear out the questions
That have come looking for a rationale, to get convincing answers.
The questions that, for very personal reasons, have come after
the fall of the usual punctuation.

#
Let the mirror explain how beautiful you are!
Remove your dusty pile of words, breathe deeply.
Remember how much I loved you, and how the whole thing
turned into an electric shock that could have caused a huge fire…in an empty warehouse!

~


 

BENGALI

Tr. SUBHODIP MAITRO/ Edited by SAPTADEEP BHATTACHARJEE

ফ্রিদা কাহলোর গোঁফ

আমি আর পাত্তা দিচ্ছি না  কাদার গন্ধ, বা বৃষ্টিকে বকাঝকা করার মতো কোনো দরকারকে, অথবা সেই
পোড়া ক্ষতটাকে যা আমার বুকে অনেকদিন ধরে দগদগে
এই অবস্থার জন্য এমন একটা জুতসই সান্ত্বনা খুঁজছি যা আমায় তোমার ঠোঁটকে পড়তে দিচ্ছে না আমার ইচ্ছেমতো
বা পারছে না তোমার লালচে পাপড়ি থেকে শিশিরের কণাগুলো মুছে দিতে
অথবা সেই আবেগকে একমুখী করতে পারছি না যা আমায় ছাড়িয়ে যায় যখন দেখি তুমি আমার পাশে নেই সেই মুহূর্তে
এবং তুমি থাকবেও না…. আমাকে যখন নিজের অবস্থান স্পষ্ট করতে হবে রাত্রের নৈঃশব্দ্যের কাছে
মনে কর যে পৃথিবীটা চুপচাপ, যেমন আমরা দূর থেকে দেখি, আর আমাদের মধ্যে যা ঘটেছে তা
একটা বাজে ঠাট্টা ছাড়া কিছু নয়, এমন ঠাট্টা যা বাড়াবাড়ি রকমের হয়ে গেছে!

#

যে দিনগুলো আমি তোমার সঙ্গে কাটাইনি তার সম্পর্কে তুমি কী ভাবো?
সেই শব্দগুলো যা আমার গভীর কষ্ট থেকে দ্রুত উবে গেছে?
সেই সব জটগুলো যেগুলো আমার বুকে জমেছে শুকনো শ্যাওলার মতো?
আমি বলতে ভুলে গেছিলাম, আমার অভ্যাস হয়ে গেছে তোমার অনুপস্থিতি (টেকনিকালি স্পিকিং)
আর সেই ইচ্ছেগুলো যারা পথ হারিয়েছে তোমার বাসনার কাছে
এবং আমার স্মৃতি ক্রমশ ক্ষয়ে চলেছে।
আমি যে আলোর পিছু ধাওয়া করছি, তা শুধু দেখার জন্য নয়, কারণ
অন্ধকার বড় ভয়ের… এমনকি আমরা তাতে রপ্ত হয়ে গেলেও!
তোমার কাছে ক্ষমা চাওয়াই কি যথেষ্ট? যা ঘটে গেছে আমি তার জন্য বেশ অজুহাত জোগাড় করেছি

#

যেহেতু প্রতিবার আমার বুকে ঈর্ষা জেগেছিল?
যেহেতু বারবার অবসাদ ঘেঁটে দিয়েছিল একেকটা নতুন দিন আমার অন্ধকার দিনগুলোর,
যেহেতু আমি বলেছিলাম মাসিকের ব্যথায় কুচকে যাবে ন্যায়নীতি আর প্রেম স্রেফ একটা ভিতু লোক যে
জীবনের হেমন্তে এসে পৌঁছে লিঙ্গের উত্থানশক্তি হারিয়েছে!

#

আমাকে স্মৃতির পাশ কাটিয়ে
বলতে হবে আমি নিশ্চিন্তে ঘুমোই।
আমাকে ছিঁড়ে ফেলতে হবে সেই প্রশ্নগুলো
যেগুলো যুক্তি খোঁজে, বিশ্বাসযোগ্য উত্তর চায়।
সেই প্রশ্নগুলো ব্যক্তিগত কারণে, যতিচিহ্নের ভেঙে পড়ার পর আসে শুধু।

#

আয়নাকে বলতে দাও তুমি কত সুন্দর!
শব্দের ধুলোর আস্তরণ সরিয়ে দীর্ঘ শ্বাস নাও
মনে রেখো আমি কতটা ভালবাসতাম তোমাকে আর সব কিছু একটা
বিদ্যুৎস্পৃষ্ট হয়ে যে বিশাল অগ্নিকাণ্ডটা ঘটাতে পারত.. তা স্রেফ একটা ফাঁকা গুদাম!

~


 

HINDI

Tr. SANDEEP KULSHRESTHA

फ्रीदा काहलो की मूछ

मैं मिट्टी की गंध, बारिश को फटकारने की ज़रूरत और जो मेरे सीने मैं एक अरसे से जलन है
उसकी अनदेखी करूँगा.
मैं एक सही सांत्वना ढूंड रहा हूँ अपनी स्तिथि के लिए जो की मुझे अपनी मर्ज़ी से तुम्हारे होठों की व्याख्या
नही करने देती
या फिर उस इच्छा की जिससे मैं ओस की बूँदो को तुम्हारी लाल पंखाड़ियों से हल्के
से छू लूँ
या फिर उस जुनून को नीचे लाऊँ जो मेरे उपर छा जाता है जब मुझे पता चलता है की तुम नही हो
लेकिन नही होगा… जब मैं रात की सज़ा देने वाली चुप्पी को अपना औचित्य समझाने को मजबूर करता हूँ.
ऐसा देखो की पृथ्वी चुप है और हम दूर से देखते हैं की जो भी हम दोनो के बीच हुआ
वो एक भद्दे मज़ाक की तरह था जो बोहत दूर हो गया है!

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जो तुम्हारे साथ दिन बीते उनके लिए तुम्हे क्या लगता है
उन शब्दों के लिए जो जल्दी से मेरे गहरे दर्द से लुप्त हो गये
और वो गाँठें जो की मेरे सीने मैं जमा हैं सुखी काई की तरह
मैं तुम्हे बताना भूल गया की तुम्हारी अनुपस्तिथि की आदत हो गयी है (तकनीकी वजह से)
और मेरी आरज़ू रास्ता भटक कर तुम्हारी इच्छाओं की तरफ जाती है
और मेरी स्मृति नष्ट होती जा रही है.
मैं प्रकाश का पीछा कर रहा हूँ, देखने के लिए नही, इसलिए की अंधेरा डरावना है… चाहे हमे
उसकी आदत ही हो जाए
क्या मेरी माफी पर्याप्त होगी? मैं बहाने बना रहा था जो कुछ भी हुआ सब के लिए.

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जब जब ईर्षा मेरे सीने मैं जाग्रत हुई,
जब जब निराशा ने मेरे काले दिनों के नये दिन तो बर्बाद किया,
जब जब मैने कहा की न्याय को मासिक धर्म की ऐंठन मिलेगी और प्यार
वो बुढ़ापे का कमज़ोर दिमाग़ नपुंसक आदमी है!

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मुझे अपनी याददाश्त से अलग हटना होगा
और दावा करना होगा की मुझे अच्छी नीद आती है.
मुझे वो सब सवाल फाड़ने होंगे
जो तर्क खोजते है, जिससे यकीनी उत्तर मिलें.
वो सवाल बोहत ही व्यकिगत कारणों से सामान्य विराम चिन्ह के पतन के बाद आए हैं.

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दर्पण को समझाने दो की तुम कितनी खूबसूरत हो!
धूल मैं जमा शब्दों के ढेर को निकालो, गहरी साँस लो.
याद करो की मैं तुम्हे कितना चाहता था, और कैसे सब कुछ उस बिजली के झटके मैं बदल गया जिससे एक बड़ी आग
लग सकती थी …एक खाली मालगोदाम मैं !

~

 


 

URDU

Tr. HUZAIFA PANDIT/ Edited by SAIMA AFREEN

FRIDA KAHLO’S KI MOOCH

Buu-e-khaak say gaafil , baraa.n ki tambih aur majrooh seenay
main makeem sholo.n say bhi munkir rahenge
Main muntazir huun kisi charay ka ki hukum hua hai
takhayul teray lalazaar honto.n kay tasawur say siwa hau
Teri surkh pankhadiyun say shabnam kay ferozaa na sametuu.n
Aur kabhi teray firaaq ka ehsaas-e-ziyaan jo zehn-o-dil pay
Teray firaaq ki abdayat ka ehsaas zehn-o-dil pay chaayay
Tau nohagar junoo.n ko muqayad karduu.n
Main talaash main huun kisi charay ki
Raat ki hazee.n khamoshi meri lachaari say jawaaz ki talabghaar hai
Farz karuu.n zameen khamosh tamashaayi hain
Aur humaray silsalay ik fareb-namaay kay siwa kuch bhi nahee

#

Teray firaaq main guzray dino.n ka tum kya ta’sur rakhti hau
teray gham ki shidat main jin alfaaz ki tabkheer hui
aur jo zakhmo.n kay girah sukhi algi ki tarah kasheeda qalib-e-dil main hain?
Main kehna bhool gaya firaaq ki ab khoo daal rakhi hai mainay (bareeqi say dekha jaaye tau)
Aur hasratai.n tumhari ab qaayil nahee
Hafizay ko bhi maqtalo.n main sajaaya jaa raha hai
Zehn say uatar gaya ki main saayil huun roshni ka, beenayi ki talab nahee hai,
fitnagar tareeqi khaufnaak hai agarchi aap is ki aadat bhi daaliye.
Kya mera ma’azrat khwah hona kaafi hoga? Kya woh sab ma’af kiya jaayega jo
waqiya hua jab main heela-o- bahana dhoondnay main masroof tha?

#

Kya ma’af hongay woh pal jab hasad ka zehr-e-halaahil nas nas main jag utha?
Har us nayay tareek din kay lamhay jo yaas main reza reza hogayay?
Har wo waqt ma’af hoga jab mainay ailaan kiya ki insaaf haiz kay dard main giraftaar hoga?
Jab mainay aitraaf kiya ki mohabbat ik um’r raseeda zaeef hai jo jinsi natwa’ani ka shikaar hai?

#

Yaado.n ki dilfareb kitab say jee churana hoga
Aur shree,n khwabo.n ka aitraaf bhi hoga
Sawaalo.n kay naqoosh mitaanay hongay
Sawaal jo zaati wajohaat kay ba’is, ma’mool kay sawaliya
nishaano.n ki shikast kay ba’ad zahir huay.

#

Ai’na mahv hai yaad-e- ghizaal chashm aur zikr-saman azaaraa.n main
Us kay naghmo.n pay bhi ik nigah-e-karam
Meri arzoo ki thi bekaraa.n, aur yeh aarzoo kaisay ek pal main barq hui,
barq jo saaray godaam ko ik lehzay main raakh kardeti!

 

(Script in original Urdu will shortly appear)


 

TAMIL

Tr. DINESH SAIRAM

ப்ரிடா காஹ்லோவின் மீசை

என் நெஞ்சாங்குழியின் சூழாய் நிற்கும்
இந்த சகதியின் வாசத்தயும்,
மழையின் தூரலயும்
நான் மறக்க கூடும்.
ஆனால் உன் இதழயோ
அதை பாரப்படுத்தும் எந்த ஒரு பனித்துளியயோ
என்னால் துடைத்து விட இயலாது…
நீ அற்ற ஒரு நிசப்த இரவின் மடியில்
தேற்றல் இன்றி தனிமயில் நான்.
சலனமற்ற இந்த பூமி,
நம்மை பார்த்து மட்டும்
ஏளனம் செய்கிறதா என்ன?

#

நீ அற்ற, நான் மட்டுமான நாட்களை
பற்றி நீ என்ன நினைக்கிறாய்?
வார்த்தைகள் அற்ற வலிகள் பற்றி?
நெஞ்சை அரிக்கும் கிருமிகளை பற்றி?
உன்னிடம் சொல்ல மறந்த வரிகள் இவை
தனிமைக்கு நான் என்னை பழக்க படுத்தி கொண்டு விட்டேன்
உன் பேராசைகள் முன்பு என் ஆசைகள் வழிதவறின.
என் ஞாபகங்கள் கடல் மணலாய் கரைகின்றன.
இருட்டில் வாழ பயம் இல்லை என்றாலும்…
வெளிச்சத்தை தேடியே திரிகின்றேன்!
ஆயிரம் பொய்யான வார்த்தைகளை மறைக்க
உண்மையான ஒரு மன்னிப்பு போதுமா?

#

மனதை கறையாக்கிய பொறாமைக்கு,
நாட்களை நீளமாக்கிய சோகத்திற்கு,
நீதியை மாதவிடாய் கொண்டவளாகவும்,
காதலை ஆண்மை தீர்ந்தவனாகவும்
ஒப்பனை செய்ததற்கு!

#

ஆழ்ந்த தூக்கமும் ஒன்று உண்டு
என்று சொல்லியாவது கொள்கின்றேன்.
அர்த்தம் அற்ற கேள்விகளை, இப்போதெல்லாம்
விலக்கியே வெய்கின்றேன்.
முற்றுப்புள்ளிகளை தாண்டி வரும்
முரணான கேள்விகள் இவை.

#

கண்ணாடிகள் உன் அழகை சொல்லும்!
இந்த சருகுகளை பொறுக்கி விட்டு,
சுவாசித்துப் பார்.
பூரணமானது உன் மீதான என் காதல் என்று உணர்.
இவற்றை எல்லாம் நான் என்னவென்று சொல்ல?
ஆள் அற்ற கிடங்கில்… ஒற்றை தீப்பொறி!

~


 

MALAYALAM

Tr. RAVI SHANKAR (Ra Sh)

ഫ്രീഡ കാലോയുടെ മീശ

ചളിയുടെ മണo ഞാന്‍ അവഗണിക്കാം, മഴയെ ശപിക്കാനുള്ള വ്യഗ്രതയും,
എത്രയോ കാലമായി എന്റെ നെഞ്ചില്‍ കൊണ്ട് നടക്കുന്ന പൊള്ളലും.
എനിക്കാവശ്യം ഒരു ശരിയായ പരിഹാരമാണ്, നിന്റെ ചുണ്ടുകളുടെ ചലനത്തെ
എനിക്ക് തോന്നുംപോലെ വ്യാഖ്യാനിക്കാന്‍ അനുവദിക്കാത്തത്.
അല്ലെങ്കില്‍, നിന്റെ ചുവന്ന ദലങ്ങളില്‍ പറ്റിപ്പിടിച്ച മഞ്ഞുകണങ്ങളെ തുടച്ചു മാറ്റുക
എന്നതാണ്. അല്ലെങ്കില്‍, നീയരികിലില്ലെന്നു അറിയുന്ന നിമിഷത്തില്‍ എന്നെ പിടി കൂടുന്ന കലിബാധയെ അടക്കുക എന്നതാണ്.
അല്ലാതെ, ഒരു ശിക്ഷയായി മാറുന്ന രാവിന്റെ മൌനത്തോട്‌ എന്റെ
ഭാഗം സമര്‍ഥിക്കുക എന്നതല്ല.
ഭൂമി നിശബ്ദമാണെന്ന പോലെ നടിക്കുക, ദൂരക്കാഴ്ചയിലെന്ന പോലെ,
അതിര് കവിഞ്ഞു പോയ ഒരു മോശം തമാശയായി നമ്മള്‍
തമ്മില്‍ ഉണ്ടായിരുന്നതിനെ കരുതുക.

#

ഞാന്‍ നിന്നോടൊപ്പം ചിലവഴിച്ച ദിനങ്ങളെ പറ്റി നീ എന്ത് കരുതുന്നു?
എന്റെ കടുത്ത വേദനയില്‍ നിന്ന് ബാഷ്പീകരിച്ചു പോയ വാക്കുകളെ പറ്റി?
ഉണങ്ങിയ ആല്ഗകളെപ്പോലെ എന്റെ നെഞ്ചില്‍ പറ്റിപ്പിടിച്ച കുരുക്കുകളെ പറ്റി?
നിന്റെ ഇല്ലായ്മയുമായി ഞാന്‍ (സാങ്കേതികമായി) പൊരുത്തപ്പെട്ടു കഴിഞ്ഞു
എന്ന് പറയാന്‍ വിട്ടു പോയി.
ആഗ്രഹങ്ങള്‍ നിന്റെ  അഭിനിവേശങ്ങളോട് അടുക്കും മുന്നേ
ദിശ മാറിപ്പോയി എന്നും.
എന്റെ ഓര്‍മകള്‍ ദ്രവിച്ചുകൊണ്ടിരിക്കുന്നു എന്നും.
ഞാന്‍ ഇപ്പോഴും വെളിച്ചത്തിന് പുറകെ
പായുകയാണെന്നും…കാഴ്ചയ്ക്കായല്ല,
ഇരുട്ട് അത്രമേല്‍ ഭീതിജനകമായത് കൊണ്ട്, നമ്മള്‍ അതുമായി പരിചയപ്പെട്ടെന്നാലും.
എന്റെ ക്ഷമാപണം മതി യാവുമോ? നല്ല ഒഴികഴിവുകള്‍ക്കായി
ഞാന്‍ പരതുമ്പോള്‍ തന്നെ സംഭവിച്ച എല്ലാറ്റിനും വേണ്ടി?

#

എന്റെ നെഞ്ചില്‍ അസൂയ ജ്വലിച്ചപ്പോളൊക്കെ തന്നെ
എന്റെ ഇരുണ്ട ദിനങ്ങളിലോരോ ദിനത്തെയും കൊടുംനൈരാശ്യം
തകര്‍ത്തപ്പോളൊക്കെത്തന്നെ
നീതിബോധത്തിനു ആര്‍ത്തവപ്പേശിവലിയല്‍ ഉണ്ടാകുമെന്നും തന്റെ വയസ്സാങ്കാലത്ത്
ധ്വജഭംഗം സംഭവിക്കുന്ന ദുര്‍ബല ഹൃദയനായ ഒരുത്തനാണ് പ്രണയം എന്നും ഞാന്‍ ജല്പ്പിച്ചപ്പോളൊക്കെത്തന്നെ.

#
എനിക്ക് എന്റെ ഓര്‍മകളില്‍നിന്ന് ഒഴിഞ്ഞു മാറേണ്ടിയിരിക്കുന്നു.
ഞാന്‍ നല്ലവണ്ണം ഉറങ്ങുന്നുന്ടെന്നു അവകാശപ്പെടെണ്ടിയിരിക്കുന്നു.
യുക്തിക്ക് നിരക്കുന്ന സമര്‍ത്ഥമായ ഉത്തരങ്ങള്‍ തേടുന്ന ചോദ്യങ്ങളെ
പിച്ചിച്ചീന്തേണ്ടിയിരിക്കുന്നു… വ്യാകരണ ചിഹ്നങ്ങളുടെ പതിവ് പ്രയോഗത്തിനുശേഷം,
തികച്ചും വ്യക്തിപരമായ കാരണങ്ങളാല്‍, ഉയരുന്ന ചോദ്യങ്ങളെ.

#

നീ എത്ര സുന്ദരിയെന്നു കണ്ണാടി വിശദീകരിച്ചുകൊള്ളട്ടെ!
നിന്റെ പൊടിയണിഞ്ഞ വാക്കുകളുടെ കൂമ്പാരത്തെ തുടച്ചു മാറ്റുക.
ശ്വാസം ദീര്‍ഘമായി ഉള്ളിലേക്ക് വലിക്കുക.
ഞാന്‍ നിന്നെ എത്ര പ്രണയിച്ചിരുന്നുവെന്നു ഓര്‍ക്കുക, എല്ലാം എങ്ങനെ ഒരു
വൈദ്യുത സ്ഫുല്ലിന്ഗമായെന്നും ഓര്‍ക്കുക- ഒരൊഴിഞ്ഞ ഗോഡൌണിനെ
ചുട്ടു ചാമ്പലാക്കാന്‍ പോന്ന ഒരു അഗ്നിഗോളം!

~


 

HAUSA

Tr. IBRAHIM MALUMFASHI

Peer reviewed by LAURA M KAMINSKI & SHITTU FOWORA

GASHIN BAKIN FRIDA KAHLO

Zan yi biris da warin tabo da ke tashi
Domin ba na bukatar tsawata wa ruwan sama
Zafi mai kama da dafi ya riga ya yi gida a cikin huhuna.
Ina neman karikitan sanyaya mani rai na irin halin da nake ciki
Amma abin ya ki, ya kuma hana ni
Fahimtar abin da labbanki ke kokarin bayyanawa
Ko goge digon raba da ke jikin furen kallonki,
Mai kyan gani kamar Dala.
Ko danne radadin zuci da damuwa
A daidai lokacin da na gane cewa
Ai kin yi man nisa, tamkar gajimare
Kuma ba za ki zama tare da ni ba
Komin nisan dare da dukan shirgin shiru da ke tattare da shi.
Halin da nake cikin tamkar a fagen wasan kwaikwayo
Duniya ta yi tsaye, can daga nesa
Shiru kake ji, kamar mai jiran tsammani,
Kuma dukkan abin da ya faru tsakaninmu
Kai ka ce barkwancin mugu, wuce-wuri!

#

Me za ki ce dangane da ranakun rashin gani na?
Ko game da kalaman da ke fitar kutse daga huhuna?
Ko kuma irin makokon da ke shuke a cikin kirjina?
Kash! Ban fada maki ba, rashin ganin ki ya zama jiki tare da ni
Fata nagari lamiri, amma tawa ta yi batan dabo
Kuma tunanina sai zaizayewa yake.
Ina ta bin lungu-lungu cikin haske, da gudu,
Ba wai don na hango komi ba,
Don duhu abin tsoro ne
Komin sabo.
Rokon gafarana zai isa
Daga abubuwan da suka wanzu?
Ko da kuwa batun nawa ba gaskiya a ciki?

#

A duk lokacin da bakin kishi ya turnike ni
A duk lokacin da dokin bacin rai ya yi sukuwa a rayuwata
A duk lokacin da na ce da duniya yaya adalci ya kasance agola
Soyayya ta kasance gurguwa da auren nesa, akwai bayani!

#

Dole in tafi ina tsallen badake da tunanina
Ina ganin barci ya yi dadi.
Dole in cisge tambayar maso neman amsa da tabbatarwa,
Tambayoyi ne da ba su da alamonin tambaya bare cikakkiyar amsa
Sai wakafi da digon aya na rayuwa.

#

Bari madubi ya shelanta irin kyawonki
Yi hanzari ki kwashe tarin bolar kalmominki, shaki iska da kyau
Tuna irin kauna da begen da nake yi maki
Amma suka koma na kunar Baki Wake
Duk da na yi aikin Tukuru
Ashe aikin Baban Giwa na so na yi, lokacin da tartsatsin wuta ya nemi
Ya kona rumbum kaicon da bai ji, bai gani ba!

~


 

FRENCH

Tr. JAMES LEWIS

La moustache de Frida Kahlo

J’ignorerai l’ordeur de boue, et le besoin de châtier la pluie,
et le brûlure qui s’est planté depuis si longtemps dans my poitrine.
Je cherche une consolation adaptée a ma situation, qui ne me permet
pas d’interpreter tes levres comme je le voudrais
Ni de brosser de tes petailles les gouttes de brume
Ni d’abattre le niveau d’obsession qui me submerge quand je me
rends compte que tú n’es pas avec moi en ce moment
Et ne le seras pas… Quand je suis forcé de justifier ma
position au silence punissant de la nuit.
Agis comme si la terre est silencieux, comme nous la voyons de loin,
et que tout ce qui c’est passé entre nous n’ était plus qu’une mauvaise blague qui est allé trop loin!

#

Qu’en penses-tú de mes jours passés sans toi?
Des mots qui s’envolaient si vite de ma douleur lourde?
Des nœuds déposés dans ma poitrine comme des algues séchées?
J’ai oublié de te dire que je me suis habitué à ton absence (parlant techniquement)
Et que les souhaits perdent leurs chemin a tes désires
Et que ma mémoire s’érode.
Que je chasse toujours la lumière, pas pour voir, mais parce que les ténèbres
sont effrayants..même si on s’y est habitué!
Mes excuses serait-il suffisant? Pour tout ce qui est passé
pendant que j’essayai de fabriquer des bons excuses?

#

Pour chaque fois que la jalousie a été suscité dans ma poitrine,
Pour chaque fois que la désespoir a ruiné un nouveau jour de mes jours sombres,
Pour chaque fois que j’ai dit que la justice sufrirait des crampes menstruelles at que
L’amour était un homme faible d’esprit à l’automne de son âge à une dysfonction érectile !

#

Je devrais contourner ma mémoire
Et prétends que je dors bien.
Il faut que j’arrache aux questions
Qui sont venus cherchant une justification, des réponses convaincantes.
Les questions qui, pour des raisons très personnelles , sont venus après
la chute de la ponctuation normale.

#

Laisses le miroir t’expliquer comment tú es belle!
Retires ta pile poussiéreuse de mots, respires profondément .
Souviens-toi combien je t’aimais, et comment le tout s’est transformé en un choc
électrique qui aurait pu causer un grand feu … dans un entrepôt vide!

~


Ashrafh Fayadh
“The Saudi Arabian court which sentenced poet Ashraf Fayadh, a Palestinian born in Saudi Arabia, to death had on their hands takfiri prejudice, not evidence. Fayadh, a prominent member of the nascent Saudi art scene who has curated several shows, is accused of growing his hair long, posing for pictures in company of women and authoring a 2008 collection of poems titled ‘Instructions Within’ that “insults the Godly self”. Fayadh, who had no recourse to legal defence, can now appeal against the verdict, but the tragedy that has struck his family is unspeakable.”
For more, read article in Times of India

Disclaimer: Mona Kareem’s translation of Ashrafh Fayad’s poem appeared on ArabLit.org. No copyright violation intended. Translators are poets who offered to volunteer in solidarity with the cause of Freedom of Expression of Ashraf Fayad. 

 

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